
विश्व कवि रवींद्रनाथ टैगोर के कविता और गीतों में प्रेम तत्व बहुत प्रमुख है। उनकी रचनाओं में प्रेम को ईश्वरीय प्रेम, मानवीय प्रेम और प्रकृति प्रेम को बहुत ही सुन्दर और सजीव रुप में दर्शाया गया है।
इतना ही नहीं उनकी कविता और गीतों में प्रेम की सजीवता, सुन्दरता और रहस्यमयता झलकता है, साथ ही यह भी परिलक्षित होता है कि प्रेम मानव जीवन को एक सार्थक एवं आनंदमय बना सकता है।
. टैगोर ने लिखा –
“आओ नव नव रुपों में तुम प्राणों में,
आओ गन्धों में, वर्णों में, गानों में “।
रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपने गीतों में मानवीय प्रेम, विशेषकर स्री पुरुष के प्रेम को सुन्दर रुप से दर्शाया है। उनकी कविताओं में वे स्री के प्रति पुरुष के प्रेम का वर्णन करते हैं लेकिन उनके बाद की कुछ रचनाओं में प्रेम को एक व्यापक अर्थ मे लेते हुए प्रेम के विभिन्न भावनाओं को चित्रित करते हैं। जैसे उन्होंने लिखा-
“छिपे आड़ में रह जाने से यों अब नहीं चलेगा,
आ जाओ, इस अन्तस्थल में आ करके छिप बैठो “
अपने प्रिय के प्रति उन्होंने लिखा –
“आ बैठी थी वह तो मेरे पास, न तब मैं जागा l
क्या जानें, वह कैसी थी? हतभागिनी नींद मेरी”!
टैगोर का मानना था कि प्रेम ही मनुष्य और ईश्वर के बीच के सम्बन्ध का आधार है, गुरुदेव वैष्णव आदर्श से भी प्रभावित थे जो मनुष्य और ईश्वर के बीच प्रेम तत्व को दर्शाता है।
. टैगोर के लिए प्रेम सर्वोच्च मार्ग है क्योंकि प्रेम जुड़ाव और एकता का प्रतीक है यह विरोधी शक्तियों को भंग किए बिना विपरीताओं के बीच एक सामंजस्य पैदा करता है।
उनकी कविताओं और गीतों में प्रेम का रुप अनन्त और असीम है जो हमेशा के लिए नया और नया ही है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं और गीतों में प्रेम का भाव निष्ठा, कोमलता और सहजता के साथ समाया हुआ है
शब्दों का कठोर प्रहार शुन्य है उनके काव्य और गीत मानों सरल सहज कोमल फूल की तरह भावों को समंदर में लहराते रहते हैं।
“चुप चुप रहना सखी, चुप चुप ही रहना,
कांटा वो प्रेम का –
छाती में बींध उसे रखना” l
