पंडित जी के जीवन से हम मेंटल हेल्थ का दृष्टांत सीख सकते हैं : प्रो पूनम टंडन

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर में पंडित दीनदयाल जी की जयंती की पूर्व संध्या पर आज एक वैचारिक गोष्ठी आयोजित की गई थी। शोधपीठ की निदेशक प्रो. सुषमा पाण्डेय, संगोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की आदरणीय कुलपति प्रो. पूनम टंडन जी, मुख्य वक्ता के रूप में गोरक्ष प्रांत के प्रांत प्रचारक आदरणीय श्री रमेश जी भाई साहब, विश्वविद्यालय की अधिष्ठाता छात्र कल्याण, प्रो. अनुभूति दुबे जी भी उपस्थित थी।
कार्यक्रम का आरंभ दीनदयाल जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्पार्चन के साथ हुआ। आगत अतिथियों का स्वागत निदेशक प्रो. सुषमा पाण्डेय जी ने तथा विषय पर प्रस्ताविकी डॉ. शैलेश सिंह जी ने किया, मुख्य वक्ता आदरणीय रमेश जी ने दीनदयाल उपाध्याय जी के व्यक्तिगत जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कैसे जीवन के आरंभ में ही उन्हें अपने पिता से, माता से, स्नेही मामी जी से, बड़े भाई से और बहन जी के जीवन से वंचित होना पड़ा इसके बावजूद उन्होंने जीवन में हार नहीं मानी । वे बहुत ही मेधावी छात्र के रूप में पहचाने गए। सबसे पहले उन्होंने अपनी शिक्षा पूर्ण की। उनका मानना था कि शिक्षा ही सर्वोपरि है और शिक्षा ही आपको अपने अंतर निहित क्षमता का साक्षात्कार कराती है। उनका जीवन पूरी तरह से भारतवर्ष के उद्धार के लिए समर्पित था। छात्र और छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल जी के जीवन से आप सभी जीवन का आवश्यक पाठ सीख सकते हैं। प्रतिकुल परिस्थितियों में भी कैसे अपनी क्षमता को निखारना है और परिस्थितियों का सामना करते हुए केवल अपने लिए नहीं बल्कि सभी के लिए एक सुगम मार्ग बनाना है। उन्होंने भजन, भोजन, भूषा, भाषा और भ्रमण के माध्यम से कुटुंब व्यवस्था का भी उल्लेख किया और कुटुंब व्यवस्था से कैसे हम समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण की योजना बना सकते हैं इसका महत्वपूर्ण सूत्र भी बताया। अंत में भारतीय संस्कृति संपूर्ण वसुधा के कल्याण के लिए जानी जाती है। छात्र छात्राओं को हमेशा अपने जीवन में स्पष्ट रूप से यह बात धारण करना चाहिए ।जो भी काम कर रहे हैं उसको निज लाभ से नहीं अपितु समाज और राष्ट्र के लाभ के लिए भी सोचें ।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर पूनम टंडन जी ने कहा कि दीनदयाल जी का जीवन एक प्रकाश स्तंभ की तरह है । उन्होंने हमें सिखाया कि संसाधनों के अभाव में भी कभी भी मानसिक रूप से कमजोर नहीं होना चाहिए । अपने को सक्षम बना कर समाज और राष्ट्र सेवा के लिए हम लोग उद्यत हो सकते हैं। उन्होंने दीन दयाल जी के जीवन संघर्ष को मेंटल हेल्थ से जोड़ते हुए कहा कि आज छात्र-छात्राओं को जिनके पास सभी संसाधन उपस्थित है लेकिन यदि उनके मन की कोई एक चीज न मिले तो फिर तुरंत वे अवसाद के शिकार हो जाते हैं । जबकि पंडित दीनदयाल जी जीवन के आरंभ में ही अनाथ हो गए थे। इसके बावजूद उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता अद्भुत थी। हमारे छात्रों को उनके जीवन से यह सीख अवश्य लेनी चाहिए।
अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद कार्यक्रम का सफल संचालन कर रहे हैं प्रोफेसर शरद मिश्रा जी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती के उपलक्ष में जो विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की गई थी, उनके विजेताओं को प्रमाण पत्र और मेडल वितरित कराए।अंत में आभार प्रकटन डॉ. अमित उपाध्याय ने किया।
कार्यक्रम में प्रो. विनोद सिंह, प्रो. विजय चहल, प्रो. प्रत्युष दुबे, डॉ. अमोद कुमार राय, डॉ. राजेश कुमार सिंह, डॉ. दुर्गेश पाल डॉ. मनीष पांडे, डॉ. मुकेश सिंह, डॉ. मीतू सिंह, डॉ. सर्वेश कुमार, डॉ. गौरव सिंह, श्रीमती ज्योति बाला, डॉ. अर्जुन सोनकर, डॉ. हर्षदेव वर्मा, डॉ. रजनीश श्रीवास्तव, डॉ. अनुपम सिंह, डॉ. अभिषेक सिंह आदि उपस्थित थे।
