वेतन न मिलने से टूटता भरोसा, बेसहारा पत्रकार- कर्मचारियों ने डीएम से लगाई आख़िरी आस

गोरखपुर।लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत करने वाले पत्रकार आज खुद टूटते नजर आ रहे हैं। राष्ट्रीय सहारा प्रेस और राष्ट्रीय सहारा समय से जुड़े पत्रकारों एवं कर्मचारियों की स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। वेतन न मिलने, प्रेस बंद होने और जबरन त्यागपत्र देने के निर्देशों के बाद बेसहारा हो चुके पत्रकार और कर्मचारी सोमवार को जिलाधिकारी दीपक मीणा से मिले और अपनी पीड़ा भावुक शब्दों में सामने रखी।
पत्रकारों और कर्मचारियों ने डीएम को बताया कि श्रमायुक्त द्वारा आरसी जारी किए जाने के बावजूद उन्हें अब तक का बकाया वेतन नहीं मिला है। हालात ऐसे हो चुके हैं कि घर का किराया, बच्चों की फीस, दवाइयों का खर्च और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है।
पीड़ित कर्मचारियों ने बताया कि 8 जनवरी 2026 को सहारा प्रबंधन द्वारा अचानक प्रेस का मुद्रण कार्य बंद करा दिया गया और कर्मचारियों से त्यागपत्र देने का निर्देश दिया गया। उसी दिन से पत्रकार और कर्मचारी बेरोजगार जैसी स्थिति में आ गए। न कोई लिखित सुरक्षा, न भविष्य की योजना और न ही किसी प्रकार की आर्थिक सहायता।पत्रकारों का कहना है कि उन्होंने अपनी समस्या को लेकर डीएलसी, श्रम विभाग, मुख्यमंत्री कार्यालय और जिला प्रशासन तक गुहार लगाई, लेकिन हर जगह से केवल आश्वासन ही मिला। किसी ने यह नहीं सोचा कि जिन पत्रकारों और कर्मचारियों को यूं ही सड़क पर खड़ा कर दिया गया है, उनके भी बीवी-बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई, इलाज और पेट भरने की जिम्मेदारी इन्हीं पर है।
मुलाकात के दौरान कई पत्रकार भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि वर्षों तक सहारा समूह के लिए दिन-रात मेहनत करने के बाद आज उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा है। कुछ कर्मचारियों ने बताया कि उन्होंने बच्चों की स्कूल फीस उधार लेकर भरी, तो कुछ ने घर चलाने के लिए जेवर तक गिरवी रख दिए।
राष्ट्रीय सहारा परिसर में पत्रकारों और कर्मचारियों ने शांतिपूर्ण धरना दिया। उन्होंने अपनी मांगों को लेकर प्रबंधन समिति से वार्ता की, लेकिन वार्ता का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। कर्मचारियों का आरोप है कि प्रबंधन केवल समय काट रहा है, जबकि उनके घरों में चूल्हे बुझने की नौबत आ चुकी है।
पत्रकारों ने यह भी कहा कि जब मीडिया संस्थान अपने ही कर्मचारियों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे, तो समाज को न्याय की उम्मीद कैसे दिलाई जाएगी। लोकतंत्र की मजबूती की बात करने वाले लोग आज अपने ही कर्मचारियों को नजरअंदाज कर रहे हैं।
जिलाधिकारी दीपक मीणा ने प्रतिनिधिमंडल की बातें गंभीरता से सुनीं और मामले में उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया। हालांकि पत्रकारों और कर्मचारियों का कहना है कि अब उन्हें आश्वासन नहीं, बल्कि तत्काल बकाया वेतन का भुगतान और भविष्य को सुरक्षित करने वाली ठोस कार्रवाई चाहिए।
राष्ट्रीय सहारा के पत्रकारों और कर्मचारियों की यह लड़ाई अब केवल वेतन की नहीं रही, बल्कि यह सम्मान, सुरक्षा और बच्चों के भविष्य की लड़ाई बन चुकी है। जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा—क्योंकि सवाल अब सिर्फ नौकरी का नहीं, बल्कि जिंदगी बचाने का है।
